नास्कार दोस्तों बहुत बहुत स्वागत है आपका एक और पोस्ट में जहां पर आज हम आपको बताने वाले है की तलाक़ पीड़ित महिलाओं को जो पेंशन मिलती है उसमें आवेदन आप घर बैठे कैसे कर सकते है तो चलिए आज की पोस्ट को पूरा पढ़ते है तलाक किसी भी महिला के जीवन में दर्दनाक अनुभव होता है, खासकर जब वह तुरंत तलाक जैसी अमानवीय प्रथा के द्वारा हुआ हो। ऐसी लाखों महिलाएं हैं जिन्हें बिना किसी चेतावनी के, एक पल में उनका घर और अधिकारों से वंचित कर दिया गया। इन्हीं पीड़ित महिलाओं को राहत देने के लिए सरकारों और सामाजिक संगठनों ने पेंशन योजनाओं की शुरुआत की है। यह ब्लॉग पोस्ट तलाक पीड़ितों के लिए चलाई जा रही विभिन्न पेंशन योजनाओं, उनके उद्देश्यों और वर्तमान स्थिति पर एक विस्तृत दृष्टि डालता है।
यूपी सरकार की पहल 6000 रुपये वार्षिक पेंशन
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रदेश की तलाक पीड़ित महिलाओं के लिए एक पेंशन योजना की शुरुआत की थी। इस योजना के तहत पीड़ित महिलाओं को 6000 रुपये प्रति वर्ष यानी 500 रुपये मासिक पेंशन देने का प्रावधान किया गया था। यह निर्णय दिसंबर 2019 में लिया गया था और सरकार ने इसे उसी वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही से शुरू करने का लक्ष्य रखा था।
दारुल उलूम देवबंद का बयान 500 रुपये मासिक एक क्रूर मजाक
भारत के प्रतिष्ठित इस्लामी शैक्षणिक संस्थान दारुल उलूम देवबंद के उलेमाओं ने सरकार की इस पेंशन योजना को काफी आलोचना का निशाना बनाया। देवबंद के मुफ्ती मौलाना इशाक गोरा ने कहा कि तलाक पीड़ित महिलाओं के साथ 500 रुपये मासिक पेंशन देना क्रूर मजाक जैसा है। उन्होंने सवाल किया कि मौजूदा समय में महंगाई के दौर में कोई इतनी रकम पर कैसे गुजर बसर कर सकता है? उन्होंने सरकार से मांग की कि पेंशन की राशि को बढ़ाकर कम से कम 5000 रुपये प्रति माह किया जाए और अन्य सुविधाएं भी मुहैया कराई जाएं।
धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं
इस पेंशन योजना पर अलग-अलग धार्मिक गुटों की भी अलग-अलग राय रही:-
1. शिया धार्मिक नेता मौलाना सैफ अब्बास ने सरकार के फैसले का स्वागत तो किया, लेकिन उनका मानना था कि 500 रुपये मासिक पेंशन देने से बेहतर होता कि सरकार तलाक पीड़ित महिलाओं के बच्चों की शिक्षा और आवास की समस्या का समाधान करती।
2. सुन्नी धार्मिक नेता मौलाना सुफियाना ने इस पूरे मुद्दे पर राजनीति होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सिर्फ 500 रुपये मासिक पेंशन देकर सरकार किस प्रकार का न्याय करना चाहती है, यह देखने वाली बात होगी।
3. ऑल इंडिया मुस्लिम वीमेन पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाहिस्ता अम्बर ने कहा, “सरकार की पहल अच्छी है लेकिन राशि बहुत कम है। 6000 रुपये की वार्षिक पेंशन से बुनियादी जरूरतों को पूरा करना मुश्किल होगा”।
तलाक पीड़ितों की वास्तविक दुर्दशा
पेंशन योजनाओं के बावजूद, तलाक पीड़ित महिलाओं की वास्तविक स्थिति बेहद दयनीय है। हिन्दुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि बरेली के कुतुब खाना इलाके की रहने वाली जरीना नामक पीड़िता ने कहा, “हम सरकार के उस निर्णय का स्वागत करते हैं जिसमें हमारे केस की कानूनी लड़ाई का खर्च उठाने का वादा किया गया है, लेकिन साथ ही हम मुख्यमंत्री से अनुरोध करेंगे कि हमें जीवन यापन के लिए कुछ नियमित वित्तीय सहायता प्रदान करें”। एक अन्य पीड़िता सुहेला, जो अमरोहा की रहने वाली और राष्ट्रीय स्तर की एथलीट थीं, ने बताया कि अधिकतर पीड़िताएं बहुत गरीब पृष्ठभूमि से आती हैं और उनके पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं होता। वे अपने पतियों की कमाई पर निर्भर होती हैं। जब पति जेल चला जाए तो उनका और बच्चों का क्या होगा?
असम सरकार की पहल अंतरिम पेंशन
सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि असम सरकार ने भी इस दिशा में कदम उठाया था। मई 2017 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने घोषणा की थी कि तलाक से पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को अंतरिम पेंशन दी जाएगी। इसके अलावा, सरकार ने एक कानून लाने की भी बात कही थी, जिसमें बेटी पैदा होने या अन्य तुच्छ कारणों पर पत्नी को तलाक देने वालों को दंडित करने का प्रावधान होगा। हालांकि, यह पेंशन केवल तलाक पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के लिए थी, जबकि अन्य समुदायों की तलाकशुदा महिलाओं को केवल कौशल विकास का लाभ दिया गया।
गैर-सरकारी पेंशन योजना मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की पहल
सरकार के अलावा कुछ सामाजिक संगठनों ने भी तलाक पीड़ित महिलाओं के लिए पेंशन योजनाएं शुरू की हैं। संघ परिवार से जुड़े संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (MRM) ने तलाक पीड़ितों के लिए एक गैर-सरकारी पेंशन योजना शुरू की थी। फरवरी 2018 में आरएसएस नेता और MRM के संरक्षक इंद्रेश कुमार ने कोलकाता में योजना का शुभारंभ करते हुए घोषणा की कि प्रभावित 100 परिवारों को शुरुआत में 10 वर्षों के लिए 500 रुपये मासिक पेंशन दी जाएगी। साथ ही, उनके बच्चों के लिए एक शिक्षा योजना भी शुरू की गई, जिसके तहत 10वीं कक्षा तक के बच्चों को किताबों और यूनिफॉर्म के लिए 1000 रुपये दिए जाने का प्रावधान था। MRM ने महाराष्ट्र में भी एक परियोजना शुरू की, जहां जरूरतमंद मुस्लिम महिलाओं को, जिनमें तलाक पीड़ित और 10 विधवाएं शामिल थीं, 500 रुपये मासिक पेंशन देने की बात कही गई। इंद्रेश कुमार ने तत्कालीन तलाक को इस्लाम और कुरान के खिलाफ बताते हुए इसे महज “मौज-मस्ती” की प्रथा करार दिया।
पेंशन योजनाओं की चुनौतियां
तलाक पीड़ितों के लिए शुरू की गई पेंशन योजनाओं के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं:
- अपर्याप्त राशि: सबसे बड़ी चुनौती पेंशन की अपर्याप्त राशि है। 500 रुपये मासिक से किसी परिवार का गुजारा करना मुश्किल है।
- आपराधिक कानून की जटिलता: तलाक विरोधी कानून में जेल की सजा का प्रावधान है। इससे पति जेल चला जाता है, लेकिन पत्नी और बच्चे आर्थिक अनिश्चितता का सामना करते हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सजा के प्रावधान से पति के लिए गुजारा भत्ता देना मुश्किल हो जाता है, जिससे पत्नी और बच्चे असुरक्षित हो जाते हैं।
- पंजीकरण जटिलताएं: पीड़ित महिलाओं के लिए औपचारिकताएं पूरी करना और पेंशन का लाभ उठाना एक कठिन प्रक्रिया होती है।
भविष्य की दिशाएं और सुझाव
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि केवल पेंशन देने से तलाक पीड़ित महिलाओं की समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके साथ निम्नलिखित उपाय भी आवश्यक हैं:
- कौशल विकास और रोजगार: पेंशन के साथ-साथ महिलाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
- बच्चों की शिक्षा पर ध्यान: तलाक पीड़िता के बच्चों की शिक्षा का प्रबंध सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए।
- कानूनी सहायता: प्रत्येक तलाक पीड़िता को निःशुल्क एवं सुलभ कानूनी सहायता मिलनी चाहिए।
- पेंशन राशि में वृद्धि: मौजूदा समय में 500 रुपये मासिक पेंशन को बढ़ाकर कम से कम 3000-5000 रुपये किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
तलाक पीड़ितों के लिए पेंशन योजनाएं एक सकारात्मक शुरुआत हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। सरकार और समाज के तौर पर हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इन महिलाओं को सिर्फ पेंशन ही नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार भी मिले। पेंशन की अपर्याप्त राशि को बढ़ाने, कौशल विकास पर ध्यान देने और कानूनी सहायता उपलब्ध कराने से ही वास्तव में इन पीड़ित महिलाओं के जीवन में बदलाव लाया जा सकता है। जब तक तलाक पीड़ित महिलाएं आर्थिक रूप से सुरक्षित और आत्मनिर्भर नहीं हो जातीं, तब तक उनके लिए पेंशन योजनाएं एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बनी रहेंगी। हालांकि, यह योजनाएं अभी अपने प्रारंभिक चरण में हैं और इनमें काफी सुधार की गुंजाइश है। यह सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि इस दिशा में ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं।







